कोरोना के इस संकट में अब आर्थिक अपराधों का अंदेशा सर पर खड़ा है

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कोरोना संकट दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है. अब इस संकट में आप किसी तीसरी आपदा को तो बिल्कुल भी नहीं झेल सकते. लेकिन मौजूदा महासंकट एक तीसरी आपदा का अंदेशा पैदा कर रहा है. वह है कानून व्यवस्था के संकट का अंदेशा.

देश को इस समय एक साथ दो मोर्चे पर जूझना पड़ रहा है. अर्थव्यवस्था से हम पहले ही परेशान थे. इधर तीन महीनों में कोरोना में फंस गए. बहरहाल अब अच्छी तरह समझ में आ गया है कि मौजूदा महामारी से निपटने का आगे का काम पैसे के बगैर हो नहीं पाएगा. लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उद्योग धंधे और दूसरे कामधाम इसलिए बहाल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि कोरोना का संकट दिन पर दिन बढ़त पर है. यानी दोहरी आपदा है. ऐसा संकट है कि अब किसी तीसरी आपदा को तो बिल्कुल भी नहीं झेल सकते. लेकिन मौजूदा महासंकट एक तीसरी आपदा का अंदेशा पैदा कर रहा है. वह है कानून व्यवस्था के संकट का अंदेशा.

अपराधों के प्रति संवेदनशील हो गए हैं हालात-अपराधशास्त्रीय अनुभव बताते हैं कि युद्धों, महामारियों और बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के बाद अपराध हरहाल में बढ़ते हैं. इस अवस्था को वैज्ञानिक भाषा में अपराध प्रवण यानी क्राइम प्रोन हो जाने की अवस्था कहा जाता है. इसीलिए कानून पालन कराने वाली संस्थाएं ऐसे मौकों पर सरकार को आगाह करती हैं कि पहले से इंतजाम करके रख लिए जाएं. संसाधनों की कमी के कारण ज्यादा इंतजाम न भी हो पाएं तो कम से कम सतर्कता की सलाह तो दी ही जाती है.

वेबसाइट का इस्तेमाल कर हैकर्स आपके डेेटा चुरा लेते हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

अंदेशा ज्यादा बड़ा क्यों है?-दरअसल कोरोना और अर्थव्यवस्था दोनों ही संकटों का आकार अभूतपूर्व है. इन हालात से उपजने वाली नई आपदा के आकार का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए. साफ दिख रहा है कि बेरोजगारी के मारे शहरों से डरकर भागे करोड़ों प्रवासी मजदूरों की समस्या उनके गांवों में पहुंचकर भी सुलटेगी नहीं. इधर अगर महीने दो महीने में कोरोना का असर कम भी हो जाए तो औद्योगिक क्षेत्रों में कामधाम शुरू का माकूल माहौल इतनी जल्दी बनता नहीं दिखता. जाहिर है संकट सिर्फ करोड़ों अकुशल और अर्धकुशल मजदूरों की बेरोज़गारी तक सीमित नहीं है बल्कि उसमें मझोले नौकरीपेशा लोगों को भी शामिल माना जाना चााहिए. इस हकीकत को कबूल करने में संकोच दिखाना बिल्कुल ठीक नहीं कि कोरोना के पहले से ही करोड़ों किसानों की तरह बीसियों लाख दूसरी औद्योगिक इकाइयां भी कर्ज लेलेकर ही अपना काम चलाती आ रही थीं. और अब कई महीनों बाद फिर से कामधंधे शुरू करने के लिए लगभग नए सिरे से आर्थिक संसाधनों का प्रबंध जरूरी होगा. यानी देश में चैतरफा आर्थिक संकट के आकार का अंदाजा अभी से लगा लेने में ही समझदारी है. और इसीलिए हमेशा से ही होता आया है कि युद्धों, महामारियों, कुदरती आपदाओं और मंदी जैसे आर्थिक संकटों के बाद का समय अपराधों के प्रति संवेदनशील या अपराध प्रवण हो जाता है.

किस तरह के अपराध बढ़ते हैं ऐसे माहौल के बाद?-वैसे तो आर्थिक कारणों से होने वाले सभी अपराधो़ से सतर्क रहने का सुझाव दिया जाता है लेकिन मौजूदा हालात में आर्थिक घोटाले घपलों को लेकर खासतौर पर सावधान हो जाना चाहिए. पैसे से परेशान लोगों को लालच देकर ठगी करने वाले इसी दौर पर पनपते हैं. चोरी लूट डकैती, उठाईगिरी और छीना झपटी की वारदात ऐसेे दौर में अचानक बढ़ने लगती हैं. जालसाजी करके कर्ज लेकर चंपत होने के मामले ऐसे दौर में और भी ज्यादा तेजी से बढ़ जाते हैं.

(सांकेतिक फोटो)

पुलिस की मौजूदा हालत-गौर किया जाना चाहिए कि लॉकडाउन लागू करवाने में सरकारी अमला तीन महीने से रात दिन तैनात है. आमतौर पर इतने लंबी लंबी पुलिस तैनातियां करने की जरूरत पड़ती नहीं है. लेकिन कई कारणों से मजबूरी बनती चली गई. लाॅकडाउन लागू करते समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि इसे बार बार आगे खिसकाना पड़ेगा. बहरहाल, इस बार पुलिस की थकान बेमिसाल है. आने वाले किसी संकट के समय ये थकान इतनी बड़ी चुनौती होगी कि अगर अभी से नहीं सोचा गया तो ऐन मोके पर कोई तरीका काम नहीं कर पाएगा. गौरतलब है कि देश का लगभग हर प्रदेश प्रतिहजार आबादी पर पुलिसवालों की उपलब्धता के मामले में बेहद दयनीय अवस्था में है. इसका कारण भी जग जाहिर है कि प्रदेशों की माली हालत हद से ज्यादा खस्ता हो चली है. लिहाजा अभी से तैयारी करके रख लेनी चाहिए कि जरूरत पड़ने पर इस अभाव की भरपाई किस तरीके से होगी.

समाजसेवी संस्थाओं का आसरा भी जाता रहा-यहां इस बात पर भी गौर कराया जा सकता है कि संकट के समय समाज सेवी सस्थाओं की सक्रियता दिन पर दिन कम होती जा रही है. संकट के समय काम आने वाला सामाजिक संस्थाओं का यह कवच पूरी तौर पर टूट चुका है. इसीलिए लाॅकडाउन से उपजे हालात में मजदूरों और जरूरतमंदों को खाना बांटने का काम इस बार निजी स्तर पर ही ज्यादा होता दिखा. वरना एक समय ऐसा भी था जब ऐसे मौकों पर हजारों सामाजिक संस्थाएं मदद के लिए दौड़ पड़ती थीं. लेकिन इसबार गुरद्वारों जैसी कुछ धार्मिक संस्थाओं को छोड इस मोर्चे पर कम ही सामाजिक संस्थाएं अपनी भूमिका निभाती दिखीं. यानी आगे अगर कानून व्यवस्था या भयावह बेकारी बेरोेजगारी के मोर्चे को संभालने में सामाजिक संस्थाओं की जरूरत आन पड़ी तो इन संस्थाओं को रातोंरात सक्रिय करने में बहुत मुश्किल आएगी.

कम से कम कोरोना और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर अब तक की गई कवायद से हमें सबक जरूर लेना चाहिए. सामान्य अनुभव है कि दोनों ही मामलों में बटन दबाने का समय आगे पीछे हो गया. दोनो ही संकटों की गंभीरता को आंकने और उसे पहले से भांपने में हमारा सरकारी अमला नाकाम दिखाई दिया. इसीलिए कानून व्यवस्था के अंदेशे के मद्देनज़र समझदारी अभी से तैयारी में है.


ब्लॉगर के बारे में

सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल ‘जनसत्ता’ के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो ‘कालचक्र’ मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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